रूस-भारत तेल व्यापार: रिपोर्ट में खुलासा, यूक्रेन युद्ध के बाद €144 अरब का आयात

यूरोपीय थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ (CREA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से भारत ने रूस से रिकॉर्ड 144 अरब यूरो (लगभग 143.88 अरब यूरो) का कच्चा तेल खरीदा है। इस भारी खरीद के साथ ही भारत, चीन के बाद रूसी जीवाश्म ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इस अवधि के दौरान रूस ने वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन बेचकर कुल 1 ट्रिलियन यूरो की कमाई की है, जिसका एक बड़ा हिस्सा भारत और चीन जैसे एशियाई देशों से आया है। भारत ने न केवल तेल, बल्कि लगभग 18.18 अरब यूरो का कोयला भी रूस से आयात किया है।
युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी महज 1% से भी कम थी, जो रियायती दरों (Discounted Rates) के कारण बढ़कर 40% के शिखर तक पहुँच गई थी। [Image showing the shift in India’s oil import basket from Middle East to Russia (2021 vs 2025)] पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने अपनी ‘ऊर्जा सुरक्षा’ को प्राथमिकता देते हुए रूस से सस्ती दरों पर तेल खरीदना जारी रखा। हालांकि, हाल के महीनों में अमेरिकी दबाव और प्रमुख रूसी तेल कंपनियों (जैसे रोसनेफ्ट और लुकोइल) पर लगे नए प्रतिबंधों के कारण इस आयात में गिरावट देखी गई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत की दैनिक रूसी तेल खरीद जुलाई 2023 के €189 मिलियन के मुकाबले जनवरी 2026 की शुरुआत में गिरकर लगभग €72.92 मिलियन रह गई है।
इस व्यापारिक समीकरण ने भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव को भी जन्म दिया है। ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीद को आधार बनाकर भारतीय निर्यात पर 25% से 50% तक का अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है। इसके जवाब में रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी भारतीय रिफाइनरियों ने जनवरी 2026 के लिए रूसी शिपमेंट में कटौती के संकेत दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब वेनेजुएला और अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से तेल आयात बढ़ाकर अपने ‘एनर्जी बास्केट’ में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। यह रिपोर्ट वैश्विक राजनीति में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और आर्थिक हितों के बीच चल रहे कठिन संतुलन को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।



